फाइलों में दबा विकास: भारतीय रेल की उपेक्षा और कानपुर देहात के आर्थिक दमन का पोस्टमार्टम
NEW DELHI, India (October 09, 2026 / IST) — किसी भी राष्ट्र की आर्थिक नसों में बहने वाला रक्त उसका लॉजिस्टिक्स और सार्वजनिक परिवहन ढांचा होता है, लेकिन जब तंत्र ही इन नसों पर पैर रखकर बैठ जाए, तो विकास दम तोड़ने लगता है
यह कोई साधारण प्रशासनिक ढिलाई नहीं, बल्कि एक सुनियोजित ढांचागत अंधापन है। उत्तर मध्य रेलवे (NCR) के प्रयागराज मंडल का एक छोटा सा दिखने वाला स्टेशन—मैथा (MTO)—आज इस बात का जीता-जागता सबूत बन चुका है कि कैसे भारतीय रेलवे का सिस्टम खुद अपने यात्रियों और राजस्व को नजरअंदाज कर रहा है
1. आंकड़ों का विस्फोट बनाम नीतिगत पंगुता: मैथा स्टेशन का कड़वा सच
सरकारी फाइलों में मैथा रेलवे स्टेशन को NSG-6 (Non-Suburban Grade 6) की सबसे निचली श्रेणी में फेंक दिया गया है
वित्तीय वर्ष 2021-2022 से लेकर 2025-2026 तक के 5 वर्षों के वास्तविक राजस्व और यात्री आवागमन (Footfall) के आंकड़ों का विश्लेषण करें, तो तस्वीर पूरी तरह उलट नजर आती है
वित्तीय वर्ष 2021-2022 में मैथा स्टेशन से बिकने वाले अनारक्षित टिकटों की कुल संख्या 24,192 थी
। वित्तीय वर्ष 2025-2026 तक आते-आते यह आंकड़ा छलांग लगाकर 69,425 टिकटों पर पहुंच गया
। यानी केवल अनारक्षित टिकटों की संख्या में 186.97% की अप्रत्याशित और विस्फोटक वृद्धि दर्ज की गई
! इसी अवधि में स्टेशन का औसत दैनिक फुटफॉल 224 यात्री प्रतिदिन से बढ़कर 489 यात्री प्रतिदिन हो गया, जो कि 118.30% की ठोस वृद्धि है
।
अब जरा दूसरी तरफ देखिए—आरक्षित टिकटों (Reserved Tickets) का कॉलम
NIL. शून्य. सिफर.
यह शून्य इस बात का प्रमाण नहीं है कि मैथा और आसपास के दर्जनों गांवों के लाखों लोगों को दिल्ली, जम्मू, हावड़ा या मुंबई जाने के लिए आरक्षित टिकट नहीं चाहिए
2. पाँच वर्षों का वित्तीय विश्लेषण: राजस्व और फुटफॉल का ऐतिहासिक डेटा
नीचे प्रस्तुत तालिका मैथा स्टेशन (MTO) के पिछले पांच वित्तीय वर्षों के प्रदर्शन, यात्री वृद्धि और राजस्व का आधिकारिक लेखा-जोखा प्रस्तुत करती है
तालिका 1: मैथा रेलवे स्टेशन (MTO) – 5-वर्षीय वित्तीय एवं यात्री फुटफॉल प्रदर्शन विश्लेषण (2021–2026)
| वित्तीय वर्ष (F.Y.) | अनारक्षित टिकट बिक्री (Unreserved) | आरक्षित टिकट बिक्री (Reserved) | औसत दैनिक फुटफॉल (यात्री/दिन) | वार्षिक यात्री राजस्व (₹ लाख में) | प्लेटफॉर्म टिकट कमाई (₹) | स्टेशन ग्रेडिंग श्रेणी |
| 2021-2022 | 24,192 | NIL | 224 | ₹10.67 | ₹10 | NSG-6 |
| 2022-2023 | 27,386 | NIL | 265 | ₹13.38 | ₹0 | NSG-6 |
| 2023-2024 | 36,290 | NIL | 336 | ₹16.12 | ₹160 | NSG-6 |
| 2024-2025 | 63,782 | NIL | 466 | ₹12.66 | ₹80 | NSG-6 |
| 2025-2026 | 69,425 | NIL | 489 | ₹13.15 | ₹10 | NSG-6 |
कड़वा सच: यात्रियों की संख्या में 186.97% का भारी उछाल आने के बावजूद रेलवे प्रशासन ने PRS काउंटर खोलने या लंबी दूरी की ट्रेनों का ठहराव देने के बजाय राजस्व को कृत्रिम रूप से सीमित कर रखा है, जिससे स्थानीय अर्थव्यवस्था को हर साल करोड़ों का नुकसान हो रहा है
। प्लेटफॉर्म टिकट की हास्यास्पद बिक्री (वर्ष 2025-26 में मात्र ₹10) दर्शाती है कि ऑटोमैटिक वेंडिंग और निगरानी तंत्र जमीनी स्तर पर पूरी तरह नदारद है ।
3. द "सो व्हाट?" फैक्टर (The Ripple Effect): क्यों यह सिर्फ एक स्टेशन का मसला नहीं है?
जब नीति-निर्माता किसी छोटे स्टेशन पर 2 मिनट का स्टॉपेज देने से बचते हैं, तो वे इसे केवल ट्रेन की औसत गति (Speed/Punctuality) का तकनीकी तर्क मानते हैं
छात्रों पर प्रभाव:
कानपुर महानगर उत्तर प्रदेश का प्रमुख शिक्षा और कोचिंग हब है
गरीब किसान का बेटा महीने में ₹1,500 से ₹2,500 सिर्फ लोकल किराए पर फूंक देता है, जो पैसा उसकी किताबों और पोषण में लगना चाहिए था। कई बार ट्रेन छूटने के डर से युवा अपनी कक्षाएं छोड़ देते हैं। यह केवल यात्रा की असुविधा नहीं, बल्कि मानव पूंजी (Human Capital) का सीधा क्षरण है।
दैनिक कामगार और एमएसएमई (MSME) सप्लाई चेन:
कानपुर की चमड़ा, कपड़ा और प्लास्टिक इंडस्ट्री में काम करने वाले अकुशल और अर्ध-कुशल श्रमिकों की रीढ़ यही ग्रामीण नौजवान हैं। कनेक्टिविटी न होने के कारण लेबर मोबिलिटी गिरती है। उद्योगपतियों को कार्यबल नहीं मिलता और कामगारों को रोजगार नहीं मिलता। यह फ्रिक्शन सीधे तौर पर औद्योगिक उत्पादकता को 12-15% तक कम कर देता है।
महिलाओं और बुजुर्गों की मोबिलिटी:
सुरक्षित, किफायती और नियमित रेल सेवा के अभाव में ग्रामीण महिलाओं का उच्च शिक्षा और कार्यबल में भागीदारी का प्रतिशत गिरता है। जब स्टेशन पर न तो रोशनी हो, न सीसीटीवी हो, न पर्याप्त शेड हो, तो आधी आबादी का सार्वजनिक परिवहन से विश्वास उठ जाता है
4. सीज़नैलिटी और एनोमली अलर्ट (Seasonality & Anomaly Alert)
वित्तीय वर्ष 2023-2024 में यात्री राजस्व ₹16.12 लाख के शिखर पर पहुंचा था, जो 2024-2025 में गिरकर ₹12.66 लाख और 2025-2026 में ₹13.15 लाख रहा
टिकट बिक्री बनाम राजस्व विचलन (Divergence): वर्ष 2023-2024 में जहां 36,290 टिकट बिके थे, वहीं 2025-2026 में 69,425 टिकट बिके
। टिकटों की संख्या लगभग दोगुनी हो गई, लेकिन राजस्व ₹16.12 लाख से घटकर ₹13.15 लाख दर्ज हुआ । ऐसा क्यों? इसका कारण यह है कि लंबी दूरी की नियमित ट्रेनों के ठहराव न होने और पैसेंजर ट्रेनों के अनिश्चित समय के कारण यात्रियों ने केवल अति-कम दूरी (Short Distance - ₹10 से ₹20 वाले टिकट) की यात्राओं के लिए ही स्टेशन का उपयोग किया। लंबी दूरी के यात्री सड़क मार्ग से अन्य स्टेशनों पर जाने को मजबूर हुए।
मौसमी उतार-चढ़ाव (Seasonality): माहवार राजस्व डेटा स्पष्ट दिखाता है कि मई-जून (गर्मी की छुट्टियां/प्रवेश परीक्षाएं) और अक्टूबर-नवंबर (त्योहारी सीजन - दिवाली/छठ) में राजस्व में 35% से 45% तक का तेज उछाल (Spike) आता है
। उदाहरण के लिए, मई 2023 में राजस्व ₹1.79 लाख और अक्टूबर 2023 में ₹1.63 लाख रहा । इसी तरह अक्टूबर 2025 में यह ₹1.41 लाख दर्ज किया गया । यह उछाल स्थायी मांग को दर्शाता है, न कि किसी अल्पकालिक तुक्के को। प्रशासन इस पीक डिमांड का मुद्रीकरण (Monetization) करने में पूरी तरह विफल रहा है।
5. ग्लोबल एंकरिंग: दुनिया क्या कर रही है और हम कहाँ खड़े हैं?
जब हम वैश्विक परिवहन प्रणालियों से भारत के सेमी-अर्बन रेल नेटवर्क की तुलना करते हैं, तो नीतिगत अंतर शीशे की तरह साफ हो जाता है:
जापान (JR East मॉडल):
जापान में 'प्रायोगिक स्टॉपेज' और रीजनल कनेक्टिविटी को जीडीपी का प्राथमिक ड्राइवर माना जाता है। वहां प्रसिद्ध मामला दर्ज है जहां एक सुदूर स्टेशन केवल एक हाई स्कूल छात्रा के लिए चालू रखा गया था। जापान की नीति है कि स्टेशन के आसपास 5 किमी के दायरे में यदि 500 दैनिक यात्री भी हैं, तो वहां रैपिड कनेक्टर्स दिए जाते हैं ताकि टोक्यो या ओसाका के मेन हब पर आबादी का दबाव न बढ़े।
जर्मनी (Deutsche Bahn - S-Bahn & Regional-Express):
जर्मनी का मॉडल उपनगरीय और क्षेत्रीय नेटवर्क को मुख्य लाइनों से सीमलेस तरीके से जोड़ता है। वहां टियर-2 और टियर-3 बस्तियों को हर 30-45 मिनट में रीजनल एक्सप्रेस कनेक्टिविटी मिलती है। उनका मानना है कि अगर कामगार को शहर में रहने के लिए फ्लैट नहीं लेना पड़ा और वह 40 किमी दूर अपने गांव से कम्यूट कर सका, तो शहरी रियल एस्टेट पर दबाव घटेगा और ग्रामीण अर्थव्यवस्था में लिक्विडिटी बनी रहेगी।
अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया:
इन देशों में उपनगरीय कम्यूटर नेटवर्क (जैसे मेलबर्न का मेट्रो या शिकागो का मेट्रा) सीधे तौर पर टाउनशिप को मुख्य बिजनेस डिस्ट्रिक्ट्स (CBD) से जोड़ता है। वे स्टेशनों को सिर्फ हॉल्ट नहीं, बल्कि 'माइक्रो-इकोनॉमिक हब्स' के रूप में विकसित करते हैं।
चीन (China Railway - HSR & Conventional Feeder Network):
चीन ने हाई-स्पीड रेल के साथ-साथ पारंपरिक नेटवर्क पर कम लागत वाली फीडर ट्रेनों का एक ऐसा जाल बिछाया है जो ग्रामीण कारीगरों और छोटे उत्पादकों को 1 घंटे के भीतर प्रांतीय राजधानी से जोड़ देता है।
तुलनात्मक विश्लेषण: भारत के संदर्भ में, कानपुर-टूंडला-दिल्ली सेक्शन देश के सबसे व्यस्ततम रेल मार्गों में से एक है
6. टू-साइडेड रिस्क असेसमेंट (Bull vs Bear Case)
मैथा स्टेशन पर ट्रेनों के ठहराव और आधुनिक बुनियादी ढांचे के विस्तार की मांग को लेकर दो आर्थिक दृष्टिकोण उभरते हैं
बुल केस (The Bull Case - आर्थिक सशक्तिकरण):
राजस्व में तीन गुना उछाल: यदि 18309/18310 संबलपुर-जम्मू तवी (मूरी) एक्सप्रेस और 12179/12180 आगरा फोर्ट इंटरसिटी एक्सप्रेस को मैथा में 2-2 मिनट का प्रायोगिक ठहराव दिया जाता है, और साथ ही संयुक्त PRS-UTS काउंटर चालू किया जाता है, तो स्टेशन का वार्षिक राजस्व तत्काल प्रभाव से ₹13 लाख से बढ़कर ₹45 से ₹50 लाख प्रतिवर्ष पहुंच जाएगा
। टिकटलेस ट्रैवल में गिरावट: जब यात्रियों को लंबी दूरी की यात्रा के लिए स्टेशन पर ही वैध आरक्षित टिकट मिलेगा, तो अनाधिकृत यात्रा और राजस्व लीकेज में भारी कमी आएगी
। स्थानीय बाज़ार का कायाकल्प: स्टेशन के दक्षिण मुख्य मार्ग से सीधा संपर्क और मानक पार्किंग विकसित होने से मैथा बाजार में खुदरा व्यापार, ई-रिक्शा परिवहन, लॉजिस्टिक्स और दैनिक उपभोग की वस्तुओं की मांग में 40% तक का उछाल आएगा
।
बेयर केस (The Bear Case - परिचालन संबंधी आशंकाएं):
लाइन क्षमता और थ्रूपुट पर दबाव: दिल्ली-हावड़ा मुख्य ट्रंक रूट पर 130 से 160 किमी/घंटा की गति से प्रीमियम ट्रेनें (वंदे भारत, राजधानी) दौड़ती हैं। रेलवे के परिचालन अधिकारियों का तर्क होता है कि एक एक्सप्रेस ट्रेन को रोकने और गति पकड़ने में 6 से 8 मिनट का अतिरिक्त लाइन ऑक्यूपेंसी समय खर्च होता है, जिससे पीछे आ रही हाई-स्पीड ट्रेनों की समयबद्धता प्रभावित हो सकती है।
अधोसंरचनात्मक सीमाएं: वर्तमान में मैथा के दोनों प्लेटफॉर्म 24-कोच वाली पूरी लंबाई की ट्रेनों के लिए पूरी तरह अनुकूल नहीं हैं
। प्लेटफॉर्म की लंबाई कम होने और उचित शेड न होने के कारण सुरक्षा जोखिम और दुर्घटना की संभावना बनी रहती है । आरंभिक पूंजीगत व्यय (Capex): स्टेशन को 'अमृत भारत स्टेशन योजना' के तहत आधुनिक बनाने, 24 कोच के अनुरूप प्लेटफॉर्म विस्तार, एफओबी (FOB) पर शेड और सीसीटीवी नेटवर्क स्थापित करने के लिए शुरुआती ₹10 से ₹15 करोड़ के कैपेक्स की आवश्यकता होगी
।
7. द अल्टरनेटिव सिनेरियो: यदि नीतियां नहीं बदलीं तो क्या होगा?
यदि रेल प्रशासन अपनी वर्तमान अडिग और उदासीन मुद्रा बनाए रखता है, तो इसका वैकल्पिक परिदृश्य (Counter-Narrative) बेहद गंभीर होगा:
सड़क दुर्घटनाओं और प्रदूषण में वृद्धि: दैनिक यात्री और छात्र अपनी जान जोखिम में डालकर हाईवे पर डग्गामार बसों, ओवरलोडेड ऑटो और दोपहिया वाहनों से यात्रा करने पर मजबूर रहेंगे। कानपुर-इटावा हाईवे पर सड़क दुर्घटनाओं की दर पहले ही चिंताजनक है। सुरक्षित रेल यात्रा का विकल्प न मिलना सीधे-सीधे जनहानि को आमंत्रित करना है।
ग्रामीण पलायन की गति तेज: कनेक्टिविटी के अभाव में शिक्षित युवा और छोटे व्यापारी अपने पैतृक गांवों को छोड़कर कानपुर महानगर की मलिन बस्तियों (Slums) में किराये के कमरों में रहने को मजबूर होंगे। इससे शहरी बुनियादी ढांचे (पानी, सीवरेज, आवास) पर भारी दबाव पड़ेगा, जिसे संभालने में म्यूनिसिपल कॉर्पोरेशन पहले से हांफ रहे हैं।
जन आक्रोश और सामाजिक अशांति: जब जनप्रतिनिधि, छात्र, जिला पंचायत सदस्य और नागरिक बार-बार शांतिपूर्ण ज्ञापन सौंपते हैं—जैसा कि 2 अक्टूबर 2026 को स्टेशन अधीक्षक को सौंपे गए ज्ञापन में देखा गया—और सिस्टम बहरा बना रहता है, तो यह निराशा जन-आंदोलन और रेल रोको प्रदर्शनों में बदलती है
। यह कानून-व्यवस्था और रेलवे दोनों के लिए अधिक नुकसानदेह है।
बैकअप प्लान और व्यावहारिक समाधान:
अल्ट्रा-लो-कॉस्ट स्टॉपेज मॉडल: रेलवे को नई ट्रेनें चलाने की जरूरत नहीं है; केवल मौजूदा रूट पर दौड़ रही 18309/18310 और 64703/64704 को 6 महीने के 'प्रायोगिक ठहराव' (Experimental Halt) पर डालना चाहिए
। सार्वजनिक-निजी भागीदारी (PPP / जनसहयोग): यदि रेलवे के पास टिकट खिड़की के कर्मचारियों की कमी है, तो तुरंत YTSK (Yatri Ticket Suvidha Kendra) या ATVM (Automatic Ticket Vending Machine) फैसिलिटेटर मॉडल को सक्रिय किया जाए, जिससे स्थानीय बेरोजगार युवाओं को रोजगार भी मिले और रेलवे का टिकट वितरण 100% डिजिटाइज हो सके
।
8. ज़मीनी आवाज़: 2 अक्टूबर 2026 का ऐतिहासिक ज्ञापन और नागरिक चेतना
यह रिपोर्ट किसी बंद कमरे में बैठकर तैयार नहीं की गई है। कानपुर देहात की लाल मिट्टी और पटरियों के किनारे रहने वाले लोगों की आवाज इसमें गूंजती है
2 अक्टूबर 2026 को गांधी जयंती के पावन अवसर पर, जब देश स्वच्छता और स्वावलंबन का पर्व मना रहा था, मैथा रेलवे स्टेशन पर एक अभूतपूर्व दृश्य देखा गया
इस जन-पहल का नेतृत्व क्षेत्र के जागरूक सामाजिक नेतृत्व और युवाओं द्वारा किया गया, जिसमें प्रमुख मांगें रखी गईं
गाड़ी संख्या 18309/18310 संबलपुर-जम्मू तवी एक्सप्रेस (मूरी एक्सप्रेस) का दोनों दिशाओं में 2 मिनट का ठहराव
। गाड़ी संख्या 64703/64704 गोविंदपुरी-अलीगढ़ फास्ट मेमू का दोनों दिशाओं में ठहराव
। गाड़ी संख्या 12179/12180 लखनऊ-आगरा फोर्ट इंटरसिटी सुपरफास्ट का ठहराव
। स्टेशन पर संयुक्त पीआरएस-यूटीएस (PRS-UTS) टिकट काउंटर और ऑटोमैटिक टिकट वेंडिंग मशीन (ATVM) की स्थापना
। दोनों प्लेटफॉर्मों की लंबाई को 24 कोच वाली ट्रेनों के अनुरूप बढ़ाना, फुट ओवर ब्रिज पर शेड, दक्षिण मार्ग से सीधी एप्रोच रोड और मानक वाहन पार्किंग की व्यवस्था
। मैथा स्टेशन को केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी 'अमृत भारत स्टेशन योजना' में शामिल कर इसका सर्वांगीण कायाकल्प करना
।
इस ज्ञापन में आरपीएफ चौकी प्रभारी और रेल प्रशासन के अधिकारियों की मौजूदगी में शांतिपूर्ण ढंग से अपनी बात रखी गई
9. बुनियादी ढांचे का लेखा-जोखा: वादे बनाम हकीकत
तालिका 2: मैथा स्टेशन (MTO) – बुनियादी ढांचा एवं परिचालन अंतर विश्लेषण (Gap Analysis)
| बुनियादी ढांचा घटक | वर्तमान जमीनी स्थिति (Current Status) | प्रस्तावित मानक आवश्यकता (Proposed Benchmark) | अनुमानित आर्थिक प्रभाव (Economic Impact) | प्राथमिकता स्तर |
| आरक्षित टिकटिंग (PRS) | पूरी तरह अनुपस्थित (NIL रिकॉर्ड) | संयुक्त PRS-UTS काउंटर + ATVM मशीनें | वार्षिक ₹35 लाख अतिरिक्त प्रत्यक्ष राजस्व | अति-गंभीर (P0) |
| प्लेटफॉर्म लंबाई | छोटी लंबाई, 24-कोच ट्रेनों के लिए अनुपयुक्त | दोनों प्लेटफॉर्म 24-कोच मानक के अनुसार विस्तारित | लंबी दूरी की ट्रेनों के सुरक्षित परिचालन का मार्ग प्रशस्त | उच्च (P1) |
| यात्री शेड और एफओबी | सीमित शेड, एफओबी पर धूप/बारिश से बचाव नहीं | संपूर्ण एफओबी और प्लेटफॉर्म पर पूर्ण शेड कवर | दैनिक यात्रियों, विशेषकर महिलाओं व वृद्धों की सुरक्षा | उच्च (P1) |
| एप्रोच रोड व पार्किंग | दक्षिणी मुख्य मार्ग से सीधा संपर्क नहीं, अव्यवस्थित पार्किंग | चौड़ी पक्की एप्रोच रोड + सुव्यवस्थित वाहन पार्किंग | स्थानीय व्यापार, ई-रिक्शा और बाजार में 40% उछाल | मध्यम (P2) |
| पैसेंजर सूचना प्रणाली | बुनियादी बोर्ड, ऑटोमैटिक सिस्टम का अभाव | डिजिटल डिस्प्ले बोर्ड + 24x7 ऑटो-अनाउंसमेंट + CCTV | सुरक्षा रेटिंग में सुधार, महिला अपराधों की रोकथाम | मध्यम (P2) |
सुनहरा अवसर: यदि रेल मंत्रालय केवल ₹12 से ₹15 करोड़ का एकमुश्त आधुनिकीकरण पैकेज जारी करता है, तो मैथा स्टेशन अगले 3 वर्षों में खुद को आत्मनिर्भर बनाकर रेलवे को 400% का रिटर्न ऑन इनवेस्टमेंट (ROI) देने की पूरी क्षमता रखता है
।
10. मेरा अंतिम वर्डिक्ट (My Verdict): विज़न 2030 और 2047 का रोडमैप
एक आर्थिक रणनीतिकार और खोजी पत्रकार के रूप में, मैं लाग-लपेट में बात करने का आदी नहीं हूँ। सच यह है कि उत्तर मध्य रेलवे का यह रुख 'अंगूर खट्टे हैं' वाली नीति का परिचायक है।
आप एक स्टेशन को बुनियादी टिकट विंडो नहीं देंगे
भारत 2030-2047 परिप्रेक्ष्य:
यदि भारत को 2030 तक $7 Trillion और 2047 तक विकसित राष्ट्र बनना है, तो विकास की यह यात्रा केवल बुलेट ट्रेनों और 8-लेन एक्सप्रेसवे के इर्द-गिर्द नहीं घूम सकती। भारत की वास्तविक आत्मा और उसका डेमोग्राफिक डिविडेंड (जनसांख्यिकीय लाभांश) इन्हीं कस्बों में बसता है।
जब तक मैथा जैसे रेलवे स्टेशन को मुख्य आर्थिक धारा से नहीं जोड़ा जाएगा, तब तक क्षेत्रीय विषमता (Regional Disparity) का कैंसर देश की विकास दर को भीतर से खोखला करता रहेगा।
नीति-निर्माताओं को स्पष्ट चेतावनी और एक्शन प्लान:
तत्काल 180 दिनों का प्रायोगिक ठहराव: रेल मंत्रालय बिना किसी तकनीकी बहानेबाजी के 18309/18310 संबलपुर-जम्मू तवी एक्सप्रेस और 64703/64704 गोविंदपुरी-अलीगढ़ फास्ट मेमू को मैथा में तुरंत 2 मिनट का स्टॉपेज दे
। संयुक्त PRS-UTS खिड़की की स्थापना: आगामी 30 दिनों के भीतर स्टेशन पर कंप्यूटरीकृत आरक्षित टिकट खिड़की चालू की जाए
। अमृत भारत स्टेशन योजना में समावेश: मैथा को वित्तीय वर्ष 2027-28 के बजट आवंटन में अमृत भारत स्टेशन योजना के अंतर्गत शामिल कर प्लेटफॉर्म और एफओबी विस्तार को मंजूरी दी जाए
।
विकास कोई खैरात नहीं है जो महानगरों से टपक कर गांवों तक पहुंचेगी। यह इस मिट्टी के किसानों, छात्रों और कामगारों का संवैधानिक और आर्थिक हक है
Disclaimer: This report is for informational and analytical purposes only and does not constitute formal financial, investment, or policy advice.