भारत का ग्लोबल ट्रेड डेफिसिट (Trade Deficit): 2030 तक का आर्थिक डेटा और चुनौतियां

भारत के ग्लोबल ट्रेड डेफिसिट के आंकड़े बताते हैं कि देश टेक इंपोर्ट पर बहुत ज़्यादा निर्भर है। क्या 2030 तक घरेलू सप्लाई चेन खुद को इससे अलग कर पाएंगी
भारत का ग्लोबल ट्रेड डेफिसिट (Trade Deficit): 2030 तक का आर्थिक डेटा और चुनौतियां
नई दिल्ली, भारत — दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र का यह दावा कि वह वैश्विक व्यापार का नया सुल्तान बनने की राह पर है, एक ऐसा भ्रम है जिसे आंकड़ों की सर्जिकल स्ट्राइक से तोड़ने की जरूरत है। आज वैश्विक व्यापार मंच पर भारत खुद को एक महाशक्ति के रूप में पेश कर रहा है, लेकिन हकीकत यह है कि नई दिल्ली का व्यापार संतुलन एक ऐसे पतले धागे पर टिका है, जहां हम अमीर देशों से हाई-वैल्यू फिनिश्ड गुड्स और तकनीक आयात कर रहे हैं, और बदले में उन्हें लो-मार्जिन कच्चा माल या असेंबल किए गए उत्पाद सौंप रहे हैं। क्या यह एक उभरते हुए ग्लोबल ट्रेड किंग की तस्वीर है, या फिर हम विकसित अर्थव्यवस्थाओं के लिए महज एक सप्लायर और उपभोगवादी बाजार (कंज्यूमर मार्केट) बनकर रह गए हैं? जब हम वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला (Global Supply Chain) के भीतर भारत के द्विपक्षीय व्यापार का एक्स-रे करते हैं, तो सतह के नीचे छिपा ढांचागत असंतुलन साफ दिखाई देता है। यह किसी देश की ताकत नहीं, बल्कि उसकी रणनीतिक लाचारी को दर्शाता है कि वह एडवांस इलेक्ट्रॉनिक्स के बदले कपास बेच रहा है। भू-राजनीतिक चक्रवात में फंसा व्यापार: भारत और पश्चिम एशिया का गणित प…